कोंडाजी फर्जंद - पन्हाळा जितने कि रोमहर्षक कहाणी


क्या आपने ग्रीक युद्ध पर बनाया सिनेमा ३०० तो देखा हे?? और शायद आप ट्रॉय के युद्ध से अनजान नही हे. पर क्या आप हमारे इतिहास कि कितनी ऐसी लडाईयो के बारे में जानते हे जो इन दो वेस्टर्न लड़ाईयो से कई ज्यादा रोमहर्षक हे. 
अगर हम हमारे इतिहास में देखे तो हमे ऐसे अनेको स्वर्णिम क्षण मिल जाते हे जो बाकि दुनिया के इतिहास से कही कम महान नही हे. 
महाराष्ट्र में एक ऐसा युद्ध हुवा था जहा इन दोनों ग्रीक युद्हो की रननिति एकसाथ देखने को मिलती हे, युद्ध था सिर्फ ६० योद्धाओ के साथ अजेय किला पन्हाला जितने का, और जिसकी कमान में ये लड़ा गया उस महान योद्धा का नाम था कोंडाजी ... कोंडाजी फरजंद...!!!
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पन्हाला और आदिलशाही

kondaji farzand and panhala

दक्षिण का दरवाजा नाम से जाननेवाला पन्हाला किला आदिलशाह के कब्जे में था, पावनखिंड की लड़ाई, और शेर बाजीप्रभु देशपांडे की शहादत महाराज अभी भूले नहीं थे और वे किसी बी हालत में पन्हाला को हिन्दवी स्वराज्य का हिस्सा बनाना चाहते थे. इस पन्हाला किले को जितने का बेडा उठाया कोंडाजी फर्जंद ने... पन्हाला एक खुली जगह पर हे, इसीकारण इसकिले को सीधे युद्ध में जितना नामुनकिन के बराबर था... इस किलेपर काफी तादात में आदिलशाही फ़ौज भी रहती थी.
३ मार्च १६७३, ३०० घुड़सवारो के साथ कोंडाजी पन्हाला की तरफ निकल पड़ा. आधी रात थी, पन्हाला से ४ मिल कि दुरी पर... घने जंगल मे, सारे ठहर गए, तब कोंडाजी दुसरे मराठा सरदार अन्नोजी दत्तो से बोले, "अन्नोजी आप २४० योद्धाओके साथ यही रुकिए, जब में किले परसे भगवा निशान लहराउंगा, आप हवा की तेजी से किले पर आक्रमण करिए"

कोंडाजी और पन्हाला

kondaji farzand

और कोंडाजी अपने ६० साथियों के साथ किले की दीवारों से भीड़ गया, इतनी विशाल दीवारे इन विरोने आसानी से पार भी कर ली.. हमले से पहले, २ महीने तक कोंडाजी ने किले की भौगोलिक स्थिति के साथ वहाँ के फ़ौज के ठिकाने इन सभी का ठीक से अभ्यास कर रखा था. बहिर्जी नाईक और गुप्तचरों की ये सूचनाये इतनी सटीक थी, की किस की गश्त कब हे ये भी कोंडाजी को पता था. कोंडाजी, सीधे शतरंज के राजा को शह देना चाहता था, किलेपर पुहचते ही कोंडाजी कुछ वीरो के साथ किलेदार के महल की तरफ बढा, किले पर पुहचे सभी मराठा वीर बिगुल बजा रहे थे, मराठा वीर इस बिगुल का शोर करते हुए किले की सेना पर टूट पड़े. मराठा सैनिको की बिगुल का शोर इतना था की आदिलशाही सेना को लगा एक बड़ी मराठा सेना किले में घुस गयी हे... वो बिखरकर भागने लगे. अपनी सेना का नेतृत्व करने किलेदार समशेर लेकर युद्ध में कूद पड़ा, अपनी फ़ौज को समटने के लिए... जब वो महल से बाहर निकला तब... उसके सामने थे कोंडाजी फरजंद... कोंडाजी और किलेदार में घनघोर लड़ाई हुयी, जिसमे कोंडाजी की समशेर का एक तेज वार किलेदार के प्राण ले गया.. किलेदार को मरा पड़ा देश उसकी सेना भागने लगी, बतक बाकि मराठा योद्धाओ ने निशान लहराकर किले के दरवाजे खोल दिए थे. अन्नोजी दत्तो और बाकि २४० वीर, आदिलशाही फ़ौज पर कहर बनकर टूट पड़े.... दक्षिण का दरवाजा अब मराठो के लिए खुल चूका था ... तो हिन्दवी स्वराज्य पर नजर रखनेवाला आदिलशाही गरुड़ बंदी बनाया गया था... हिंदवी स्वराज्य का भगवा ध्वज शान से सुबह के सुरज का स्वागत कर रहा था. जित और हार में एक छोटासा अंतर होता हे, जो इस छोटेसे अंतर को पार कर गया वो विजेता कहलाता हे. कोंडाजी ने उस अंतर को पार कर पन्हाला जित लिए था... 
छत्रपति संभाजी महाराज के वक्त कोंडाजी इसीतरह अजेय दुर्ग जंजीरा से भीड़ गया था, और कोंडाजी ने इस दुर्ग को भेद भी लिया था, पर आखरी पलो में जीता किला वो हार गये थे, अगर आपको कोंडाजी फरजंद और जंजिरा की कहानी सुनानी हे तो हमे कमेन्ट कर बताये.(जल्द ही ये कहानी आप पढ़ सकेंगे)

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