Friday, August 4, 2017

गोरखालंड कि मांग कितनी सही कितनी गलत ?

गोरखालंड कि मांग कितनी सही कितनी गलत ?

पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में सिक्किम और नेपाल से सटे स्थित हे... Queen Of Hills यानि दार्जिलिंग घाटी की हसीन वादिया जो अपनि चाय और अलौकिक सुन्दरता के लिए जानि जाती हे. दुनिया की सबसे खुबसूरत जगहो में से एक.
जून २०१७ ममता बनर्जी सरकार ने बंगाली भाषा को पुरे राज्य में सक्ति से लागू करने की घोषणा कर दी... और इस कारन पश्चिम बंगाल के पहाड़ी प्रदेश में एक अशांतता की लहर दौड़ पड़ी. दुसरे ही दिन ममता ने घोषित कर दिया की ये सक्ती पहाड़ी इलाके के लिए नहीं हे... पर तब तक एक बुझी हुयी चिंगारी एक बार फिर से आग बन चुकी थी.
नमस्कार मित्रो स्वागत हे आपका मिथक टीवी में. देशभक्ति और International Politics शृंखला में आज हम बात करेंगे गोरखालैंड अशांतता की.

कहते हे " किसी एक का Nationalism किसी दुसरे के लिए Terrirism होता हे" आज गोरखालैंड राज्य की मांग बंगाली लोगो के लिए किसी terrirism से कम नहीं हे तो गोरखा लोग इसे Nationalism से कम नहीं समझते.
१७८० तक दार्जिलिंग और उसके आजूबाजू का इलाका सिक्किम के चोग्याल साम्राज्य के अंतर्गत आता था, पर तब सिक्किम और नेपाल में हुए एक युद्ध के दौरान नेपाल ने इस प्रदेश को अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया था.

तभी से इस प्रदेश में गोरखा जाती की जनसँख्या में बढ़ोत्तरी होने लगी ये वाही वक्त था जब अंग्रेज भारत में अपने पैर पसार रहे थे. सत्ताविस्तार के प्रयास में गोरखा और अंग्रेज दोनों के बिच १८१४ में पहला एंग्लो-गोरखा युद्ध हुवा, गोरखाओ के कड़े मुकाबले के बावजूद अंग्रेजो ने दार्जिलिंग area पर अपना हक जमा लिए.

आज २०० साल से भी ज्यादा होगये, गोरखालैंड बंगाल का हिस्सा बने हुए.
जब प्रदेश का कोई हिस्सा या समुदाय अन्य हिस्सों या समुदायों के मुकाबले पिछड़ा रह जाता हे तब उसमे असुरक्षा की भावना जाग उठती हे उन्हें लगता हे की इस पिछड़ेपन के कारन वे और उनकी सभ्यता कही लुप्त हो जायेंगे. नए राज्य की मांग ऐसीही असुरक्षितता की भवना से होती हे. तेलंगाना का निर्माण, विदर्भ और अन्य राज्यों की मांग इसी भावना के प्रभाव में हुयी हे.
१९०७ में सबसे पहली बार दार्जिलिंग प्रदेश में एक स्वतंत्र प्रशासनिक संस्था की मांग की गयी थी, जिसे १९१७ में दोहराया गया पर उसपर ज्यादा विचार नहीं किया गया.

१९४७ को जब भारत स्वतंत्र हुवा तब कम्मुनिस्ट party ने एक mamorandum भारत सरकार को दिया था जिसमे एक दार्जिलिंग प्रदेश में गोरखास्थान राज्य के गठन की मांग थी. १९५२ में अखिल भारतीय गोरखा legue के N B Gurung ने भी एक स्वतंत्र गोरखा राज्य की मांग की थी
आज भी गोरखा प्रदेश के लोग सभ्यता, भाषा, दिखावट और जमीनी अंतर की भी बात करे तो की बात करे तो वे बंगाल से ज्यादा नेपाल से करीबी हे.

 १९८० तक इस मांग को किसीने बहोत जोर के साथ पेश नहीं नहीं किया गया था और ये सिर्फ एक memorandum देना या सरकार से अपील करने तक सिमित था. पर १९८० आते आते स्वतंत्र गोरखा राज्य की मांग ने काफी जोर पकड़ने लग गयी थी, १९८६ में गोरखा national liberation front के सुभाष घिशिंग के नेतृत्व में एक बहोत बड़ा violent agitation  हुवा जिसमें १२०० से भी ज्यादा जाने गयी. आज गोरखा मुक्ति मोर्चा के बिमल गुरंग इन्ही सुभाष घिशिंग के शिष्य हे
तब केंद्र सरकार और बंगाल की सरकार ने स्थानीय लोगो से त्रिपक्षीय समझोता किया, जिस से गोरखाओ को उनकी भाषा संस्कृती की सुरक्षितता के आश्वासित किया गया, इसी के चलते नेपाली भाषा को भारत की २२ सरकारी भाषाओ में शामिल किया गया.

वैसे तो गोरखालैंड की समस्या लगभग ख़त्म हो गयी थी, पर Political power Game के चलते आज इस प्रदेश में अशांतता हे.

इस अशांतता के कई राजकीय पहलु भी हे, बिमल गुरंग जो NDA के सहयोगी पक्षों में शामिल हे उन के नेतृत्व में गोरखा मुक्ति मोर्चा ने ममता बनर्जी की चिंगारी को आग बना दिया हे. सत्ताधारी बीजेपी तो छोटे राज्यों के पक्ष में हे और उनके २०१४ के लोकसभा चुनाव के मेनिफेस्टो के अनुसार "वे छोटे ethnic group के प्रश्न को सहानभूति से देखेंगे" इस कारन गोरखाओ का उत्साह काफी बढा हे गुरंग भी इस मौके का फायदा उठा कर अगर स्वतंत्र गोरखा राज्य बनालेते हे तो वे गोरखालैंड में अगले कई सालो-दशको तक सत्ता के शीर्ष पर होंगे.
हाल ही में हुए चुनाव में दार्जिलिंग क्षेत्र में पहली बार ममता को १ सीट मिली और ममता बनर्जी भी अपना प्रभाव इस क्षेत्र में बढ़ाना चाहती हे इसीलिए उन्होंने ४५ सालो के बाद पहली बार दार्जिलिंग में अपने कैबिनेट की मीटिंग ली. २०११ में सत्ता में आने के बाद उन्होंने गोरखा विभागीय परिषद् का भी निर्माण किया था

आज गोरखालैंड में काफी अशांतता हे पर फिर भी शायद ही गोरखालैंड एक राज्य बनाने की आज कोई संभावना हे क्योकि ये एक राज्य की मांग से ज्यादा राजकीय सत्तास्पर्धा हे. गोरखालैंड में शैक्षेनिक संस्थाओ के विकास के साथ अन्य Infrastructure का विकास ही इस प्रश्न का असली उत्तर हे

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